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Thursday, 5 January 2012

प्रेमचंद

प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के महानतम लेखकों में हैं। वाराणसी के नज़दीक लमही गाँव में जन्मे प्रेमचंद हमारे समाज के विभिन्न वर्गों और पक्षों का बेहतरीन चित्रण करते हैं। उन के साहित्य में विशेष तौर पर समाज के ग़रीब, शोषित वर्गों, और महिलाओं का मार्मिक चित्रण है। हमारे स्वतन्त्रता आन्दोलन और हमारी मिली-जुली, गंगा-जमुनी संस्कृति के दृश्य हमें उन के साहित्य में देखने को मिलते हैं। गोदान, सेवा सदन, कर्मभूमि, निर्मला, रंगभूमि जैसे उपन्यासों, बूढी काकी, शतरंज के खिलाड़ी, ईदगाह, पूस की रात, बड़े भाई साहब, कफ़न, ठाकुर का कुआँ, सद्गति, ढाई सेर गेहूँ जैसी कहानियों, और नाटक करबला में ये सब गुण देखने को मिलते हैं।


प्रेमचन्द को प्रगतिशील लेखकों में अग्रणी माना जाता है। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के अवसर पर वे सभापति थे। उन से प्रेरित हो हिन्दी साहित्य के कई लेखक आगे बढ़े। कुछ लोग प्रेमचन्द को भारत में वही दर्जा और स्थान देते हैं जो रूसी साहित्य में गोर्की को दिया जाता है।  


 

जीवन परिचय
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उन की माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। उन की शिक्षा का आरंभ उर्दू, फ़ारसी से हुआ और जीवनयापन का अध्यापन से।  कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इस के बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। उन का उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को उन का निधन हो गया।
कृतियाँ
प्रेमचंद की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की किन्तु प्रमुख रूप से वह कथाकार हैं। उन्हें अपने जीवनकाल में ही उपन्यास सम्राटकी पदवी मिल गयी थी। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से कुछ अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हज़ारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है। उन्होंने रंगभूमि’ तक के सभी उपन्यास पहले उर्दू भाषा में लिखे थे और कायाकल्प से ले कर अपूर्ण उपन्यास मंगलसूत्र’ तक सभी उपन्यास मूलतः हिन्दी में लिखे। प्रेमचन्द कथा-साहित्य में उन के उपन्याकार का आरम्भ पहले होता है। उन का पहला उर्दू उपन्यास (अपूर्ण) असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्यउर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज़-ए-ख़ल्क़'’ में 8 अक्तूबर, 1903 से 1 फ़रवरी, 1905 तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। उन की पहली उर्दू कहानी दुनिया का सब से अनमोल रतन कानपुर से प्रकाशित होने वाली ज़माना नामक पत्रिका में 1908 में छपी। उन के कुल 15 उपन्यास है, जिन में 2 अपूर्ण हैं। बाद में इन्हें अनूदित या रूपान्तरित किया गया। प्रेमचंद की मृत्यु के बाद भी उन की कहानियों के कई सम्पादित संस्करण निकले जिन में कफ़न और शेष रचनाएँ 1937 में तथा नारी जीवन की कहानियाँ 1938 में बनारस से प्रकाशित हुए। इस के बाद प्रेमचंद की ऐतिहासिक कहानियाँ तथा प्रेमचंद की प्रेम संबंधी कहानियाँ भी काफ़ी लोकप्रिय साबित हुईं। नीचे उन की कृतियों की विस्तृत सूची है।
समालोचना
प्रेमचंद उर्दू का संस्कार ले कर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने। हिन्दी को अपना खास मुहावरा ऑर खुलापन दिया। कहानी और उपन्यास दोनो में युगान्तरकारी परिवर्तन पैदा किए। उन्होने साहित्य में सामयिकता का प्रबल आग्रह स्थापित किया। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और उस की समस्याओं पर खुल कर कलम चलाते हुए उन्हें साहित्य के नायकों के पद पर आसीन किया। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्ज़खोरी, ग़रीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। प्रेमचन्द की ज़्यादातर रचनाएं उन की ही ग़्रीबी और दैन्यता की कहानी कहती हैं। यह भी ग़लत नहीं है कि वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उन की रचनाओं में वे नायक हुए, जिन्हें भारतीय समाज अछूत और घृणित समझा था। उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की एक नई परंपरी शुरू की।





  प्रेमचंद पर जारी डाक टिकट             संस्थान में भित्तिलेख



आभार: यह सामग्री विकिपीडिया से ली गयी है। सब के लिए उपलब्ध इस  संसाधन के हम शुक्रगुज़ार हैं।

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